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Monday, April 20, 2026
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तालिबानी विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी का देवबंद दौरा धार्मिक और कूटनीतिक दृष्टि से क्यों बन गया चर्चा का केंद्र

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री और तालिबान नेता आमिर खान मुत्ताकी शनिवार को देवबंद आएंगे। वे दरुल उलूम के कुलपति मुफ्ती अब्दुल कासिम नोमानी, मौलाना अरशद मदानी और अन्य मदरसा शिक्षकों से मुलाकात करेंगे। उनका दौरा दरुल उलूम और मस्जिद की यात्रा के साथ होगा। इस दौरान वह कक्षाओं में हदीस की पढ़ाई का अवलोकन भी करेंगे। देवबंद 1866 में स्थापित हुआ था और यह इस्लामिक शिक्षण संस्थाओं जैसे दरुल उलूम का जन्मस्थान है।

धार्मिक और कूटनीतिक संदेश

मुत्ताकी का यह दौरा धार्मिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह पाकिस्तान के दावे को चुनौती देता है कि वह देओबंदी इस्लाम का संरक्षक और तालिबान का मुख्य समर्थनकर्ता है। मुत्ताकी की देवबंद यात्रा यह संदेश देती है कि तालिबान की धार्मिक जड़ें भारत में हैं, न कि पाकिस्तान में। यह दर्शाता है कि तालिबान अब पाकिस्तान पर अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक निर्भरता कम कर रहा है और भारत की ओर रुख कर रहा है।

तालिबानी विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी का देवबंद दौरा धार्मिक और कूटनीतिक दृष्टि से क्यों बन गया चर्चा का केंद्र

अफगान छात्रों का देवबंद में अध्ययन

रिपोर्टों के अनुसार, आमिर खान मुत्ताकी शनिवार को सुबह 11:00 बजे देवबंद दरुल उलूम पहुंचेंगे। छात्रों द्वारा उनका स्वागत किया जाएगा। वर्तमान में दरुल उलूम में 15 अफगान छात्र पढ़ रहे हैं। 2000 के बाद लागू सख्त वीज़ा नियमों के कारण अफगान छात्रों की संख्या कम हो गई है। पहले दरुल उलूम में सैकड़ों अफगान छात्र अध्ययन के लिए आते थे।

दरुल उलूम: तालिबान के लिए आदर्श

तालिबान दरुल उलूम को अपने मदरसों और इस्लामी विचारधारा के लिए आदर्श मानता है। जो छात्र दरुल उलूम में पढ़ाई करते हैं उन्हें वर्तमान अफगान सरकार में नौकरी के अवसरों में प्राथमिकता दी जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि देवबंद और दरुल उलूम तालिबान के धार्मिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण में कितना प्रभाव रखते हैं।

इतिहास और सम्मान का प्रतीक

दरुल उलूम में पहले भी अफगान शासकों के दौरे हुए हैं। 1958 में अफगानिस्तान के तत्कालीन राजा मोहम्मद जहीर शाह ने दरुल उलूम का दौरा किया था। उनके नाम पर दरुल उलूम में “बाब-ए-जहीर” का द्वार बनाया गया है। मुत्ताकी के दौरे से यह इतिहास और सम्मान की परंपरा जारी रहती है और यह भारत-अफगानिस्तान धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों की महत्वपूर्ण कड़ी बनता है।

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