संसद का मानसून सत्र: हंगामे, टकराव और अधूरे विमर्श के बीच स्थगित
संसद का मानसून सत्र 21 अगस्त, गुरुवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। यह सत्र शुरुआत से ही विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच तीखे टकराव और हंगामे से घिरा रहा। स्थिति यहां तक पहुंची कि पूरे सत्र के दौरान 166 घंटे व्यर्थ हो गए। संसद की कार्यवाही ठप रहने से जनता के टैक्स का लगभग 248 करोड़ रुपये डूब गए। इस सत्र के दौरान कई अहम मुद्दे उठे, लेकिन बहस और विमर्श के बजाय ज्यादातर समय आरोप-प्रत्यारोप और विरोध प्रदर्शन में निकल गया।
टीएमसी का केंद्र सरकार पर हमला
सत्र के समाप्त होने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पूरे मानसून सत्र में रक्षात्मक मुद्रा में रही और संसद को बाधित करने के तरीके खोजती रही। टीएमसी नेता ने सत्तारूढ़ गठबंधन को कमजोर बताया और कहा कि 239 सीटों वाला मोदी गठबंधन दबाव में नजर आया।
डेरेक ने यह भी आरोप लगाया कि संसद का समय व्यर्थ करने के पीछे सरकार की रणनीति थी, ताकि असहज करने वाले सवालों और विपक्ष के हमलों से बचा जा सके। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि यह सत्र सरकार की कमजोरी और अव्यवस्था को उजागर करता है।
मानसून सत्र की प्रमुख घटनाएं
यह मानसून सत्र कई घटनाओं के कारण चर्चा में रहा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’, बिहार में मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर उठा विवाद, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा और सुप्रीम कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव इसकी प्रमुख झलकियां रही।

सत्र के दौरान विपक्ष ने कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश की, वहीं सरकार ने अंतिम दिनों में तेजी से विधायी कार्य निपटाकर अपनी मजबूती का संदेश देने की कोशिश की।
27 विधेयक हुए पारित
हंगामे के बावजूद संसद में 27 विधेयक पारित किए जा सके। इनमें से राज्यसभा में 15 और लोकसभा में 12 विधेयक पारित हुए। हालांकि, इन विधेयकों पर गंभीर चर्चा नहीं हो सकी। अधिकांश विधेयक या तो बिना बहस के पारित कराए गए या फिर औपचारिक चर्चा के बाद ध्वनिमत से पारित कर दिए गए।
लोकसभा की कार्यवाही लगभग 84.5 घंटे बाधित रही, जबकि राज्यसभा का लगभग 81.12 घंटे का समय हंगामे की भेंट चढ़ गया। नतीजतन, राज्यसभा की कार्यवाही मात्र 38.88 घंटे ही चल पाई।
अधूरी रही अंतरिक्ष कार्यक्रम पर चर्चा
देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर विशेष चर्चा भी इस सत्र में अधूरी रह गई। विपक्ष ने इसमें भाग नहीं लिया, जिससे यह महत्वपूर्ण चर्चा अधर में ही समाप्त हो गई। इससे यह सवाल भी उठे कि क्या संसद अपनी मूल भूमिका—नीतिगत बहस और राष्ट्रहित के मुद्दों पर विमर्श—से भटक रही है।
जनता का नुकसान
संसद का समय व्यर्थ होने से जनता को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। अनुमान के मुताबिक, 166 घंटे बर्बाद होने के कारण करीब 248 करोड़ रुपये जनता के टैक्स के डूब गए। यह सवाल विपक्ष और जनता के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर इतनी बड़ी राशि व्यर्थ होने के बावजूद संसद से जनता को क्या मिला।
संसद का मानसून सत्र 2024 लगातार हंगामे, अधूरे विमर्श और अधूरे विधायी कार्य का प्रतीक बन गया। जहां विपक्ष ने सरकार को बचाव की मुद्रा में होने का आरोप लगाया, वहीं सरकार ने विपक्ष को विकास कार्यों में बाधा डालने वाला करार दिया। लेकिन असलियत यह है कि इस पूरे सत्र में जनता के मुद्दों पर गंभीर बहस कम और राजनीतिक टकराव ज्यादा नजर आया।
संसद से जनता की अपेक्षा होती है कि वहां नीतियों, कानूनों और देशहित के मुद्दों पर गहन विमर्श हो। लेकिन मानसून सत्र इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा और यह जनता के संसाधनों की भारी बर्बादी का कारण बना।

