सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने एक सशक्त संदेश देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट आम आदमी के लिए है। उन्होंने लंबित मामलों के तेजी से निपटान के लिए एक निश्चित समय सीमा और एक राष्ट्रीय एकीकृत न्यायिक नीति को अपनी प्राथमिकता बताया। एक मीडिया समूह द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने न्याय तक पहुंच को आसान बनाने पर जोर दिया और कहा कि मुकदमेबाजी की लागत कम करना और मामलों का समयबद्ध निपटान सुनिश्चित करना जरूरी है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सवाल पर उन्होंने संवैधानिक शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लेख किया और बताया कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के कार्य स्पष्ट रूप से संविधान में परिभाषित हैं।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पुरानी पेंडिंग मामलों का समाधान
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि तीनों संस्थाएं स्वतंत्र रहते हुए एक-दूसरे के पूरक हैं और किसी का दखल दूसरों के क्षेत्र में नहीं होता। उन्होंने बताया कि पुराने लंबित मामलों को साफ करना बहुत आवश्यक है और इसके लिए मध्यस्थता को प्रभावी उपाय के रूप में अपनाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कुछ मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि सामान्य जनता को न्याय में देरी न हो। इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि अकेले वह यह काम नहीं कर सकते, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों ने भी पूरा सहयोग दिया है।

न्यायपालिका को नए डिजिटल युग की चुनौतियों से निपटना होगा
CJI ने कहा कि न्यायपालिका को नई चुनौतियों का सामना करना होगा जैसे डिजिटल गिरफ्तारी और साइबर अपराध। उन्होंने कहा कि नए युग की इन चुनौतियों से निपटने के लिए न्यायिक अधिकारियों को तैयार करना जरूरी है। इसके लिए उन्हें आधुनिक तकनीक और कानून की समझ में सुधार करना होगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका में विभिन्न सामाजिक और क्षेत्रीय समुदायों के न्यायाधीशों को शामिल करने के लिए ठोस प्रयास किए जा रहे हैं ताकि न्यायपालिका में विविधता बनी रहे।
न्यायपालिका में विविधता और सामाजिक समावेशन
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने समाज के विकास और देश की प्रगति के साथ एक बड़ा बदलाव देखा है। अब न्यायपालिका में महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को उचित प्रतिनिधित्व देने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि मध्यस्थता भी एक प्रभावी उपकरण साबित हो रही है जो दोनों पक्षों के लिए लाभकारी है। यह प्रक्रिया न केवल मुकदमों के समय और खर्च को कम करती है बल्कि विवादों के शांति से समाधान में भी मदद करती है।
पूर्व CJI बी.आर. गवई ने बताया अपने समुदाय से आलोचना का अनुभव
पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने मुंबई विश्वविद्यालय में एक व्याख्यान में बताया कि उन्होंने आरक्षण के संदर्भ में “क्रीमी लेयर” सिद्धांत को लागू करने के फैसले के बाद अपने ही समुदाय से आलोचना झेली। उन्होंने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को न केवल भारतीय संविधान के निर्माता बल्कि सकारात्मक भेदभाव (affirmative action) के भी महान शिल्पकार बताया। गवई ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का मकसद सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। यह सिद्धांत इंद्रा साहनी मामले में स्पष्ट किया गया था, जिसका वे समर्थन करते हैं।

