चीनी वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में अब तक का सबसे ठंडा कृत्रिम पदार्थ बनाने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। चीन के तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन पर शोधकर्ताओं ने रूबिडियम परमाणुओं के बादल को परम शून्य से महज 9.7 ट्रिलियनवां डिग्री ऊपर तक ठंडा कर दिया। यह तापमान 9.7 पिकोकेल्विन के बराबर है। वैज्ञानिकों ने इस अत्यंत ठंडे बादल के विस्तार को सात सेकंड तक देखा, जो धरती पर किए जाने वाले ऐसे प्रयोगों की तुलना में कहीं लंबा समय है। यह शोध शुक्रवार को प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका साइंस में प्रकाशित हुआ है।
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पिकोकेल्विन क्या होता है
पिकोकेल्विन, केल्विन का एक ट्रिलियनवां हिस्सा होता है। परम शून्य वह न्यूनतम तापमान है जो सैद्धांतिक रूप से संभव है और इसका मान शून्य से 273.15 डिग्री सेल्सियस नीचे होता है। नया रिकॉर्ड कमरे के तापमान से करीब एक लाख अरब गुना कम है। यह बताना जरूरी है कि 9.7 पिकोकेल्विन का आंकड़ा परमाणुओं के बेहद धीमे विस्तार को दर्शाता है, इसका यह मतलब नहीं है कि प्रयोग के उपकरण या आसपास का वातावरण भी उसी तापमान पर पहुंच गया था।
पिछला रिकॉर्ड कैसे टूटा
इससे पहले सबसे ठंडे कृत्रिम पदार्थ का रिकॉर्ड 38 पिकोकेल्विन का था, जिसे 2021 में एक जर्मन टीम ने बनाया था। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर नासा की कोल्ड एटम लैबोरेटरी ने 2022 में 52 पिकोकेल्विन का तापमान हासिल किया था। नया रिकॉर्ड इन दोनों से कई गुना कम है। यह प्रयोग तियांगोंग स्टेशन के मेंग्तियान प्रयोगशाला मॉड्यूल में लगे अल्ट्राकोल्ड एटम फिजिक्स सुविधा में किया गया। इसमें पेकिंग यूनिवर्सिटी, शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्टिक्स एंड फाइन मैकेनिक्स और चीनी विज्ञान अकादमी के टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग सेंटर फॉर स्पेस यूटिलाइजेशन के शोधकर्ता शामिल थे।
अंतरिक्ष में प्रयोग क्यों जरूरी था
धरती पर गुरुत्वाकर्षण की वजह से परमाणुओं को बहुत कमजोर जाल में बांधकर रखना और छोड़ने के बाद लंबे समय तक देखना मुश्किल होता है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के भौतिकी के प्रोफेसर और 2001 के नोबेल पुरस्कार विजेता वोल्फगैंग केटरले ने बताया कि धरती पर यह बादल सात सेकंड में करीब 250 मीटर नीचे गिर जाता, इसलिए इसके लिए 250 मीटर ऊंचा वैक्यूम चैंबर चाहिए होता। अंतरिक्ष स्टेशन की सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण वाली स्थिति में परमाणुओं को बहुत कमजोर जाल में रखा जा सकता है और लंबे समय तक देखा जा सकता है। टीम ने लेजर प्रकाश से परमाणुओं को बांधने वाली ऑल-ऑप्टिकल ट्रैपिंग तकनीक का इस्तेमाल किया। पहले वाष्पीकरणीय शीतलन से ज्यादा ऊर्जावान परमाणुओं को बाहर निकाला गया, फिर गैर-एडियाबैटिक विस्तार से और ठंडा किया गया। सूक्ष्म गुरुत्व में वाष्पीकरणीय शीतलन कम असरदार होता है, इसलिए शोधकर्ताओं ने एक अतिरिक्त चुंबकीय ग्रेडिएंट का इस्तेमाल कर इस प्रक्रिया को बेहतर बनाया।
आगे क्या मिलेगा
परमाणुओं को इतना ठंडा करने पर वे बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट नाम की अवस्था में पहुंच सकते हैं, जिसमें परमाणुओं का समूह सामूहिक क्वांटम व्यवहार दिखाता है। इससे वैज्ञानिक क्वांटम घटनाओं को अलग-अलग परमाणुओं से बड़े स्तर पर देख सकते हैं। यह ऑप्टिकल सिस्टम क्वांटम सिमुलेशन के मौके भी देता है। लेजर प्रकाश के पैटर्न से बने ऑप्टिकल लैटिस में परमाणुओं को क्रिस्टल जैसी व्यवस्था में रखकर उन पदार्थों के गुणों का अनुकरण किया जा सकता है, जिनका सीधे अध्ययन करना मुश्किल है। यह काम एटम इंटरफेरोमीटर में भी मदद करेगा, जो परमाणुओं के तरंग जैसे गुणों का इस्तेमाल कर त्वरण और गुरुत्वाकर्षण जैसे प्रभावों को मापते हैं। लीबनिज यूनिवर्सिटी हैनोवर के भौतिकी प्रोफेसर अर्न्स्ट रासेल के अनुसार इन यंत्रों की संवेदनशीलता परमाणुओं के इंटरफेरोमीटर में बिताए समय के वर्ग के साथ बढ़ती है। ऐसे प्रयोग पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को मापने और डार्क मैटर के मॉडलों की जांच में भी मदद कर सकते हैं। यह सुविधा 2022 में मेंग्तियान मॉड्यूल के साथ लॉन्च की गई थी, जबकि इसकी परियोजना 2011 में शुरू हुई थी। जमीन पर 20 घन मीटर जगह और 10 टन वजन वाली प्रणाली को अंतरिक्ष यान में फिट होने लायक करीब 0.7 घन मीटर और आधे टन के यंत्र में समेटा गया था। केटरले ने इस उपलब्धि को परमाणु तापमिति और सटीक मापन को आगे बढ़ाने का बेहतरीन शुरुआती बिंदु बताया है।

