राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने गठन के सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं। वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में शुरू हुआ यह संगठन अब अपने शताब्दी वर्ष के समापन की ओर बढ़ रहा है। इस मौके पर इंदौर में स्वयंसेवकों का एक बड़ा एकत्रीकरण आयोजित किया गया, जिसमें संघ की आगे की रणनीति पर भी चर्चा हुई। इंदौर में ही संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक भी हुई है और फिलहाल संघ के कई बड़े पदाधिकारी शहर में ही प्रवास पर हैं।

शुरुआत महाराष्ट्र से, अब देशभर में विस्तार
संघ के शुरुआती दौर में उसका काम महाराष्ट्र में शाखाएं लगाने और हिंदू विचारों के प्रचार तक सीमित था। समय के साथ संगठन की गतिविधियों का दायरा लगातार बढ़ता गया। सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में भी संघ ने अपनी उपस्थिति मजबूत की। आपदा के समय स्वयंसेवकों के सेवा कार्यों ने संगठन की सामाजिक भूमिका को और मजबूत किया। इन सौ वर्षों में संघ ने कई उतार-चढ़ाव भी देखे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश में संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था। कांग्रेस नेताओं ने संघ से जुड़े पदाधिकारियों पर भगवा आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप भी लगाए। इन सबके बावजूद वैचारिक तौर पर संघ की मूल दिशा में बड़े बदलाव नहीं हुए, लेकिन राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक भूमिका और कार्यशैली में परिवर्तन जरूर देखने को मिले।
गणवेश में बड़ा बदलाव
संघ का पारंपरिक गणवेश सफेद शर्ट, काली टोपी, खाकी निकर और चमड़े के बेल्ट से मिलकर बना था। हालांकि वर्ष 2016 में इसमें बड़ा बदलाव किया गया। खाकी निकर की जगह भूरे रंग की फुल पैंट को गणवेश में शामिल किया गया और चमड़े के बेल्ट की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी गई। अब स्वयंसेवक बदले हुए गणवेश में शाखाओं और अन्य आयोजनों में शामिल होते हैं। यह बदलाव संघ की बदलती कार्यशैली का सबसे दिखाई देने वाला प्रतीक माना जाता है।
बीते दशक में बढ़ा विचारधारा से जुड़े दलों का प्रभाव
संघ खुद को सामाजिक संगठन मानता है और प्रत्यक्ष रूप से चुनावी राजनीति से दूर रखता है, लेकिन उसकी विचारधारा से जुड़े राजनीतिक दलों के सत्ता में आने से संघ का प्रभाव भी बढ़ा है। केंद्र में पिछले 12 वर्षों से भाजपा की सरकार है। इस दौरान अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया। ये दोनों ही मुद्दे लंबे समय से संघ के प्रमुख एजेंडे में शामिल रहे हैं।
प्रांत व्यवस्था खत्म, अब 88 संभागों में होगा काम
हाल ही में इंदौर में हुई बैठक में संघ की संगठनात्मक व्यवस्था में बदलाव पर सहमति बनी है। इसके तहत प्रांत व्यवस्था के स्थान पर संभाग व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया गया है। देशभर में संघ के 46 प्रांत थे, लेकिन अब संगठन 88 संभागों के माध्यम से अपना काम करेगा। नई व्यवस्था के अनुसार संघ में पदों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों का निर्धारण भी किया जाएगा।
समाज के हर वर्ग तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति
अब संघ समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अपनी पैठ और गहरी करना चाहता है। इसके लिए संघ अपने अनुषांगिक संगठनों की संख्या बढ़ाने के साथ ही सामाजिक संगठनों के साथ भी सहभागिता करेगा। संघ के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर का कहना है कि संघ समाज के विभिन्न वर्गों को अपने साथ जोड़ेगा। इसके अलावा शाखाओं की संख्या भी बढ़ाई जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग संघ के विचारों को जान सकें। अब संघ शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यों पर भी अधिक ध्यान दे रहा है। इंदौर में ही संघ ने माधव सेवा न्यास के माध्यम से लोगों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं।

