मध्य प्रदेश के दवा उद्योग पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। इंदौर और उज्जैन की तीन दवा कंपनियों ने अफ्रीकी देश अंगोला में दवा भेजने के लिए जो अनापत्ति प्रमाणपत्र लगाए थे, वे जांच में फर्जी निकले। इसके बाद केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने तीनों कंपनियों के संबंधित दवा निर्यात पर एक साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। यह कार्रवाई चुपचाप हुई, लेकिन अब इसके सामने आते ही यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या कई कंपनियां वर्षों से इसी तरह की धांधली के सहारे निर्यात करती रही हैं।

किन कंपनियों पर लगी पाबंदी
कार्रवाई की जद में आई कंपनियों में सेलवैल फार्मास्यूटिकल्स, दानिश हेल्थ केयर और सुपर फॉर्मूलेशंस शामिल हैं। सेलवैल कंपनी इंदौर के सांवेर रोड औद्योगिक क्षेत्र में स्थित है, जबकि दानिश हेल्थ केयर और सुपर फॉर्मूलेशंस उज्जैन में दवा निर्माण करती हैं। तीनों ने बीते महीनों में सीडीएससीओ से दवा निर्यात की अनुमति मांगी थी। इन कंपनियों की योजना अंगोला को दवा की खेप भेजने की थी।
अलग-अलग प्रारूप ने खोला राज
निर्यात अनुमति जारी करने से पहले सीडीएससीओ ने कंपनियों से तमाम दस्तावेजों के साथ-साथ दवा आयात करने वाले देश की एनओसी भी मांगी थी। कंपनियों ने अपने आवेदनों के साथ एनओसी संलग्न कर दी। शक तब हुआ जब एक ही देश की एनओसी का प्रारूप तीनों कंपनियों के रिकॉर्ड में अलग-अलग मिला। सीडीएससीओ के इंदौर कार्यालय ने इस विसंगति को गंभीरता से लिया और दिल्ली को पत्र लिखा। इसके बाद एनओसी की जांच शुरू हुई और संबंधित देश से मिली रिपोर्ट में साफ हो गया कि ये प्रमाणपत्र फर्जी हैं।
नियम क्यों हुए सख्त
भारतीय दवाओं को लेकर बीते वर्षों में कई सवाल उठे थे। करीब तीन साल पहले अफ्रीकी देश कैमरून में खांसी की दवा से बच्चों की मौत के मामले में भी इंदौर की एक दवा कंपनी का नाम सामने आया था। ऐसे मामलों के बाद केंद्र के औषधि नियामक ने निर्यात नियम कड़े कर दिए। पहले कंपनियों को आयातक देश के कारोबारी के ऑर्डर के साथ दवा की रिपोर्ट और सीडीएससीओ की एनओसी की जरूरत होती थी। पिछले साल से यह नियम बना दिया गया कि निर्यात करने वाली कंपनी को उस देश की सरकार की एनओसी भी पेश करनी होगी, जो दवा आयात कर रहा है। तभी निर्यात की खेप भेजने की अनुमति जारी होगी।
निर्माताओं का पक्ष: गलती हमारी नहीं
कार्रवाई के दायरे में आए निर्माता अब कह रहे हैं कि गलती उनकी नहीं है। सेलवैल फार्मास्यूटिकल्स के संचालक कमल करमचंदानी ने कहा कि वे वर्षों से इसी तरीके से निर्यात कर रहे हैं और आयातक देश के एजेंट पर भरोसा किया था। एजेंट ने जो दस्तावेज दिए, वही लगाए गए। उनका यह भी कहना है कि उनकी कंपनी का फॉर्मूलेशन वहां रजिस्टर्ड नहीं था और उन्होंने तो सिर्फ एक ही दवा की निर्यात अनुमति मांगी थी, जबकि अन्य कंपनियों के कई फॉर्मूलेशन थे जिन पर कार्रवाई हुई। दानिश हेल्थकेयर के प्रमुख कासिम अली ने कहा कि कंपनी इस मामले में लगातार पत्राचार कर रही है, सीडीएससीओ का सहयोग किया है और हर जानकारी उपलब्ध कराई है। कंपनी वर्षों से निर्यात कर रही है, गलती उसकी नहीं है। उज्जैन के सुपर फॉर्मूलेशन के संचालक दिनेश जैन चर्चा के लिए उपलब्ध नहीं हुए।
नियमों के अनुसार हुई कार्रवाई
सीडीएससीओ इंदौर के अधिकारी नवनीत सिंह ने कहा कि संगठन के नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं। इंदौर से प्रकरण जांच के लिए मुख्यालय भेजा गया था और उसके बाद नियमानुसार कंपनियों पर कार्रवाई हुई है। इससे ज्यादा वे कुछ बता नहीं सकते। यह मामला एक बार फिर यह सवाल छोड़ जाता है कि निर्यात की कागजी प्रक्रिया में एजेंटों पर आंख बंद कर भरोसा कितना सुरक्षित है, और नियामक की नजर से बचकर फर्जी दस्तावेज कब तक चल सकते हैं।

