back to top
Thursday, November 5, 2026
Homeराजनीतिसुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: बीना विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता पर...

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: बीना विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता पर 2 महीने में फैसला

मध्य प्रदेश की सियासत में लंबे समय से चल रहे बीना विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और सख्त निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में दो महीने के भीतर अंतिम फैसला लें। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 4 नवंबर 2026 को यह आदेश सुनाया।

दलबदल कानून के तहत जल्द फैसला जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल से जुड़े मामलों का निपटारा जल्द से जल्द होना चाहिए। अदालत का मानना है कि ऐसे मामलों को लंबे समय तक लटकाए रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए ठीक नहीं है। इसी आधार पर विधानसभा अध्यक्ष के लिए दो महीने की समय सीमा तय की गई है। इस निर्देश के बाद अब इस मामले में जल्द स्पष्टता आने की उम्मीद बढ़ गई है।

क्या है पूरा मामला

निर्मला सप्रे ने साल 2023 में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बीना सीट से जीत दर्ज की थी और पहली बार विधायक बनीं। इसके बाद मई 2024 में लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान वे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मंच पर भाजपा के एक कार्यक्रम में नजर आईं। इसी घटनाक्रम के बाद जुलाई 2024 में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष उनकी सदस्यता समाप्त करने की याचिका दाखिल की थी। कांग्रेस का आरोप रहा है कि सप्रे ने जनादेश के साथ विश्वासघात किया है।

सप्रे का पक्ष और हाईकोर्ट का रुख

निर्मला सप्रे की ओर से लगातार यह कहा जाता रहा है कि उन्होंने न तो कांग्रेस से आधिकारिक तौर पर इस्तीफा दिया है और न ही भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है। इसी तर्क के आधार पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जून 2026 में उनकी सदस्यता रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष के पास मामले की सुनवाई चल रही है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट इस रुख से सहमत नहीं हुआ और उसने कहा कि दलबदल विरोधी कानून के तहत याचिकाओं पर निश्चित और समयबद्ध फैसला होना ही चाहिए।

सिंघार ने फैसले का स्वागत किया

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय लोकतंत्र और संविधान की गरिमा को मजबूत करेगा। सिंघार का कहना है कि जनता ने सप्रे को कांग्रेस के टिकट पर चुना था, इसलिए दलबदल करने वालों को कानून के तहत जवाबदेह बनाना जरूरी है। याचिका की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने अदालत में दलील दी थी कि सप्रे ने कांग्रेस छोड़ने के बाद भाजपा के लिए प्रचार भी किया था।

आगे क्या होगा

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब गेंद विधानसभा अध्यक्ष के पाले में है। उन्हें दो महीने के भीतर सप्रे की सदस्यता को लेकर अंतिम निर्णय लेना होगा। इस फैसले का सीधा असर बीना सीट के राजनीतिक भविष्य पर पड़ेगा और यह भी तय होगा कि दलबदल विरोधी कानून का क्रियान्वयन प्रदेश में कितना प्रभावी रहता है। राजनीतिक हलकों में इस आदेश को एक बड़ी नजीर के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में भी दलबदल के मामलों में देरी पर रोक लगने की उम्मीद है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments