Supreme Court ने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे आंगमो की ओर से दायर याचिका की सुनवाई आठ जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी है। यह याचिका राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत वांगचुक की हिरासत को चुनौती देती है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी बी वराले की पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान यह फैसला लिया। जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि पीठ गुरुवार को इस मामले पर सुनवाई करेगी। याचिका में यह दावा किया गया है कि वांगचुक की हिरासत अवैध और मनमानी है, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
हिरासत पर सवाल और केंद्र का जवाब
इस मामले में सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने वांगचुक की ओर से पैरवी की। इससे पहले जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारी की बेंच ने याचिका की सुनवाई की थी। केंद्र और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 24 नवंबर को याचिका पर जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई स्थगित कर दी थी। अदालत ने 29 अक्टूबर को याचिका पर केंद्र और लद्दाख प्रशासन से जवाब मांगा था।
लद्दाख हिंसा और वांगचुक की गिरफ्तारी
26 सितंबर को लद्दाख के छठे अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद सोनम वांगचुक को रासुका के तहत हिरासत में लिया गया था। इन प्रदर्शनों में चार लोगों की मौत और लगभग 90 लोग घायल हुए थे। सरकार ने वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया था। याचिका में यह भी कहा गया है कि हिरासत आदेश पुरानी प्राथमिकी, अस्पष्ट आरोपों और अटकलबाजी भरे दावों पर आधारित है, जिसका हिरासत के आधारों से कोई सीधा संबंध नहीं है।
याचिका में वांगचुक के योगदान की बात और विरोध
गीतांजलि आंगमो की याचिका में कहा गया है कि यह हास्यास्पद है कि लद्दाख और पूरे भारत में शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक समय से वांगचुक के योगदान को देखते हुए उन्हें अचानक निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा के लिए वांगचुक जिम्मेदार नहीं हैं। आंगमो ने बताया कि वांगचुक ने सोशल मीडिया पर हिंसा की कड़ी निंदा की थी और इसे लद्दाख की शांति और पांच वर्षों के प्रयासों का नुकसान बताया था। उनका कहना था कि यह उनके जीवन का सबसे दुखद दिन था।

