फिल्म रामायण सिनेमाघरों में धूम मचा रही है और इसके भव्य सेटों की चर्चा हर जगह हो रही है। लेकिन पर्दे पर दिखने वाली इस शानदार दुनिया के पीछे इंदौर की एक बेटी की मेहनत भी है। इंदौर में जन्मीं प्रियांशी अग्रवाल ने फिल्म के आर्ट डिपार्टमेंट में सेट डिजाइनर के रूप में काम करते हुए दशरथ के दरबार को आकार दिया है।
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फोटोग्राफी के शौक से शुरू हुआ सफर
प्रियांशी ने वर्ष 2017 में पुणे से फिल्ममेकिंग की पढ़ाई शुरू की थी। स्कूल के दिनों से ही उन्हें फोटोग्राफी का शौक था और वह परिवार व दोस्तों के फोटोशूट करती थीं। इसी रुचि ने उन्हें सिनेमैटोग्राफी और फिर आर्ट डिपार्टमेंट की ओर आकर्षित किया। वर्ष 2021 में उन्होंने अपना पहला प्रोजेक्ट किया। इसके बाद उन्होंने सेक्रेड गेम्स, ब्रीद इनटू द शैडोज और पाताल लोक जैसे प्रोजेक्ट्स में काम किया। रामायण उनके करियर का अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है। इसके लिए उन्होंने प्रोडक्शन डिजाइनर और आर्ट डायरेक्टर से संपर्क किया था, जिसके बाद मीटिंग और चयन की प्रक्रिया पूरी हुई।
45 दिन में तैयार हुआ दशरथ का दरबार
प्रियांशी बताती हैं कि दशरथ का दरबार सबसे बड़े और चुनौतीपूर्ण सेटों में से एक था। इसे तैयार करने में 45 दिन से अधिक का समय लगा। इसकी डिजाइनिंग के लिए अजंता-एलोरा की कलाकृतियों, पुरानी किताबों और ऐतिहासिक चित्रों से संदर्भ लिए गए। रामायण के समय के महलों का कोई प्रत्यक्ष दृश्य प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऐसे में लिखित साक्ष्यों के आधार पर उस दौर की दुनिया की कल्पना कर उसे वास्तविक रूप देना चुनौतीपूर्ण था। इस दौरान उन्होंने 70 से 80 लोगों की टीम को गाइड किया।
सिंहासन में छिपे हैं कई पौराणिक प्रतीक
दशरथ का सिंहासन प्रियांशी के लिए इस प्रोजेक्ट की सबसे खास चीजों में से एक है। इसे इक्ष्वाकु वंश की पहचान को दर्शाने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया। चूंकि राम सूर्यवंशी थे और भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं, इसलिए सिंहासन में सूर्य, घोड़े और मत्स्य अवतार से जुड़े प्रतीकों को शामिल किया गया। इसकी हर छोटी डिटेल के पीछे एक खास संदर्भ रखा गया। सेट को वास्तविक दिखाने के लिए अलग-अलग मटेरियल और पेंटिंग तकनीकों का इस्तेमाल हुआ। उदाहरण के लिए दशरथ का सिंहासन फाइबर से बनाया गया, लेकिन उसे इस तरह तैयार किया गया कि वह सोने की धातु से बना दिखाई दे। लकड़ी और प्लाई पर पेंटिंग के जरिए दीवारों और अन्य संरचनाओं को भी वास्तविक रूप दिया गया।
अयोध्या और लंका के लिए अलग रंग और रोशनी
फिल्म में अयोध्या और लंका को दो अलग-अलग वातावरण के रूप में तैयार किया गया। प्रियांशी के अनुसार अयोध्या को गर्म रंगों, प्राकृतिक रोशनी, फूलों और हरियाली से भरपूर दिखाया गया है। वहीं लंका का स्वरूप ठंडे रंगों और कम रोशनी वाला रखा गया। रावण के शासनकाल की लंका को कहानी के डार्क पक्ष से जोड़कर दिखाने का प्रयास किया गया।
500 से अधिक लोगों ने किया काम
प्रियांशी बताती हैं कि निर्माता नमित मल्होत्रा और निर्देशक नितेश तिवारी इस प्रोजेक्ट पर दस साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं। फिल्म के अलग-अलग विभागों में 500 से अधिक लोगों ने योगदान दिया है। आर्ट, वीएफएक्स, कॉस्ट्यूम, कैमरा, एक्शन और लैंडस्केपिंग जैसी टीमों ने मिलकर काम किया। सेट की डिजाइनिंग के दौरान 3डी मॉडल तैयार किए जाते थे, जिन्हें निर्देशक और निर्माता के सामने प्रस्तुत किया जाता था। इससे सेट बनने के बाद बड़े बदलावों की जरूरत नहीं पड़ती थी।
16 घंटे की शिफ्ट और युवाओं को सलाह
प्रियांशी की जिम्मेदारी केवल सेट तैयार करवाने तक सीमित नहीं थी। फर्नीचर कहां रखा जाएगा, दरबार में राजा और मंत्रियों के बैठने की व्यवस्था कैसी होगी और कैमरे के फ्रेम में कौन सी चीज दिखाई देगी, इन सभी बातों का ध्यान रखना पड़ता था। सामान्य दिनों में करीब 16 घंटे काम होता था, जबकि कई बार 24 से 36 घंटे तक लगातार काम करना पड़ता था। इंदौर के युवाओं को सलाह देते हुए वह कहती हैं कि किसी भी अवसर को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए। शुरुआत में कम पैसे मिलने पर भी अनुभव के लिए काम करते रहना चाहिए। उनके अनुसार एआई के दौर में भी इंसानी रचनात्मकता की अपनी अलग अहमियत है। रामायण में मुख्य डिजाइनिंग हाथ से बनाए गए स्केच और कलाकारों की कल्पना के आधार पर की गई है।

