राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष विजयदशमी उत्सव और शस्त्र पूजन कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर से बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हम सबके पूर्वज एक हैं और जब भी हम बंटे, कमजोर हुए। यह कार्यक्रम नागपुर में संघ की परंपरा के अनुसार आयोजित किया गया, जहां भागवत ने पहले स्मृति मंदिर में संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की और फिर शस्त्र पूजन किया। इस कार्यक्रम में जगदीप धनखड़ भी मौजूद रहे।

भारत विविधता का देश, एकता ही शक्ति
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने भारत की विविधता का जिक्र करते हुए कहा कि भारत माता का सर्वोच्च स्थान है। देश में अलग-अलग पंथ, प्रांत, जातियां, भाषाएं, खानपान और रीति-रिवाज हैं, लेकिन भारत को एकजुट होकर आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि देश पहले भी एक होकर आगे बढ़ा है और भविष्य में भी इसी एकता के साथ आगे बढ़ता रहेगा।
स्वदेशी और संत रविदास का संदेश
भागवत ने कहा कि RSS पिछले 100 वर्षों से भारत को उसकी अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं के आधार पर संगठित और मजबूत बनाने का काम कर रहा है। संघ के शताब्दी वर्ष में जिन पांच प्रमुख बदलावों पर जोर दिया जा रहा है, उनमें अपनी पहचान का बोध और स्वदेशी चीजों को अपनाना शामिल है। उन्होंने संत रविदास को भी याद किया और कहा कि जब देश विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों का सामना कर रहा था और हर ओर डर का माहौल था, तब संत रविदास ने स्वधर्म के प्रति निष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का संदेश दिया।
नई पीढ़ी और नशे की समस्या पर चिंता
संघ प्रमुख ने नई पीढ़ी के लिए सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी सीखने के लिए उत्सुक रहती है और नई चीजें उसे आकर्षित करती हैं, लेकिन उसे सही-गलत का अंतर समझना चाहिए। समझ की कमी के कारण व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में कई दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं। ड्रग्स की बढ़ती समस्या पर भी उन्होंने चिंता जताई और कहा कि आज की पीढ़ी नशीली दवाओं की आदी होती जा रही है — अभिभावकों को आने वाली पीढ़ी को इससे बचने की सीख देनी चाहिए।
1925 से चली आ रही परंपरा
गौरतलब है कि साल 1925 में दशहरे के ही दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी। संघ में दशहरे के मौके पर शस्त्र पूजन की परंपरा रही है और देशभर में पथ संचलन के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। यह परंपरा संघ की मजबूती और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।

