एक ही परिवार में किसी सदस्य को ल्यूपस, किसी को टाइप-1 डायबिटीज और किसी और को मायोसाइटिस जैसी अलग-अलग बीमारियां क्यों होती हैं? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली चार साल तक शोध करेगा। इस परियोजना में देश के छह प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के सहयोग से 200 परिवारों को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। शोध को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद से वित्तीय सहायता मिल रही है।

ऑटोइम्यून बीमारी क्या होती है
ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही स्वस्थ ऊतकों और कोशिकाओं पर हमला करने लगती है। ल्यूपस भी ऐसी ही एक बीमारी है, जो शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित कर सकती है। शोध का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि एक ही परिवार में अलग-अलग सदस्यों को अलग-अलग ऑटोइम्यून बीमारियां होने के पीछे कौन से साझा जैविक कारक जिम्मेदार हैं।
कैसे होगा यह शोध
शोध में आधुनिक जीनोमिक और प्रतिरक्षाविज्ञान संबंधी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। शोधकर्ता बीमार सदस्यों के साथ उनके स्वस्थ रिश्तेदारों के नमूनों की भी जांच करेंगे। परिवार के सदस्यों के नमूनों की तुलना करके ऐसे आनुवंशिक बदलावों और प्रतिरक्षा संबंधी संकेतकों का पता लगाया जाएगा, जो अलग-अलग बीमारियों में समान हो सकते हैं।
किन परिवारों को शामिल किया जाएगा
अध्ययन में ऐसे परिवारों को शामिल किया जाएगा, जिनमें कम से कम तीन सदस्य ऑटोइम्यून बीमारी से पीड़ित हों और दो सदस्य स्वस्थ हों। प्रत्येक परिवार में कम से कम एक व्यक्ति को सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस होना जरूरी है। इसके अलावा परिवार में मायोसाइटिस, टाइप-1 डायबिटीज या सजोग्रेन सिंड्रोम जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
शोधकर्ताओं की उम्मीद और अपील
एम्स के रूमेटोलॉजी विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. रंजन गुप्ता के अनुसार, ऑटोइम्यून बीमारियों के लिए केवल आनुवंशिक बनावट जिम्मेदार नहीं होती। पर्यावरण और अन्य जैविक कारक भी इनके विकास में भूमिका निभाते हैं। परियोजना का समन्वय सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी के डॉ. विक्रम गांधी कर रहे हैं। टीम ने पीड़ित परिवारों से अध्ययन में भाग लेने की अपील की है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इससे ऑटोइम्यून बीमारियों के जोखिम का आकलन करने और नए उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकेगी।

