मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने शहर में बढ़ते ध्वनि प्रदूषण पर कड़ा रुख अपनाते हुए कई अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत के इस फैसले से इंदौर के लोगों को शोर की समस्या से राहत मिलने की उम्मीद जगी है, खासकर उन इलाकों में जहां सुबह-सुबह कचरा गाड़ियों की तेज आवाज लोगों की नींद और शांति में खलल डालती है।

कचरा वाहनों के शोर पर सख्ती
न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जयकुमार पिल्लई की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता अमिताभ उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए नगर निगम को कचरा संग्रहण वाहनों से होने वाले शोर में कम से कम 25 प्रतिशत तक कमी लाने के निर्देश दिए। अदालत ने नगर निगम को तीन सप्ताह के भीतर वाहनों की आवाज को निर्धारित डेसिबल सीमा के भीतर लाने की कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कचरा गाड़ी के आगमन की सूचना देना जरूरी है, लेकिन इसके लिए लाउडस्पीकर की आवाज अत्यधिक तेज रखना उचित नहीं है।
हर थाने में ध्वनि मापक यंत्र
उच्च न्यायालय ने पुलिस प्रशासन को भी शहर के प्रत्येक थाने में ध्वनि मापक उपकरण उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। अदालत ने संबंधित थानों के संपर्क नंबर समाचार पत्रों तथा इंदौर पुलिस की वेबसाइट पर सार्वजनिक करने के निर्देश दिए हैं, ताकि नागरिक शोर से जुड़ी शिकायतें सरलता से दर्ज करा सकें। सुनवाई के दौरान खजराना क्षेत्र के सहायक पुलिस आयुक्त आशीष पटेल ध्वनि प्रदूषण मापने वाला उपकरण लेकर उपस्थित हुए थे। हालांकि अदालत को बताया गया कि सार्वजनिक स्थानों पर शोर मापने और संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए इस उपकरण का उपयोग अब तक नहीं किया गया है। इस पर पीठ ने टिप्पणी की कि इन उपकरणों का असली लाभ तभी मिलेगा जब इन्हें शिकायतों पर कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों को दिया जाए। इसलिए पीठ ने इंदौर के हर थाने में ध्वनि मापक उपकरण अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने का स्पष्ट निर्देश दिया।
साइलेंस जोन की पूरी सूची छपेगी
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य शासन द्वारा साइलेंस जोन की सूची के प्रकाशन से संबंधित पूर्व आदेश का समुचित पालन न होने पर असंतोष जताया। अदालत ने 24 सितंबर को व्यापक प्रसार वाले दैनिक समाचार पत्रों में साइलेंस जोन की पूरी सूची प्रकाशित करने का आदेश दिया था, लेकिन सुनवाई के दौरान शासन की ओर से समाचार पत्रों के केवल कुछ अंश ही प्रस्तुत किए गए। पीठ ने इसे पूर्व आदेश का उचित अनुपालन नहीं माना और पूरी सूची दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने नागरिकों से ऐसे अन्य संवेदनशील स्थानों के बारे में भी सुझाव मांगे हैं, जिन्हें साइलेंस जोन में शामिल किया जाना चाहिए। इससे अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास शोर पर प्रभावी नियंत्रण पाने में आम लोगों की भागीदारी बढ़ेगी।
हर वार्ड से दो स्वयंसेवक
उच्च न्यायालय ने नवरात्र और दशहरा पर्व के दौरान शहर में अनियंत्रित ध्वनि प्रदूषण पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि उत्सवी सीजन के दौरान शोर सीमा से अधिक रहा और पुलिस इसके स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में असफल दिखाई दी। अदालत ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि विभिन्न पुलिस थानों में मिली ध्वनि प्रदूषण संबंधी शिकायतों का ब्योरा तथा पुलिस द्वारा स्वयं संज्ञान लेकर की गई कार्रवाई का विवरण रिकॉर्ड पर रखा जाए। ध्वनि प्रदूषण की सतत निगरानी के लिए अदालत ने आम नागरिकों को जोड़ने की व्यवस्था दी है। प्रत्येक थाना प्रभारी को अपने क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड से दो स्वयंसेवक नामित करने होंगे। ये स्वयंसेवक तेज आवाज करने वाले लोगों या वाहनों की सूचना तत्काल पुलिस को देंगे और जरूरत होने पर मोबाइल से वीडियो भी बना सकेंगे। अदालत ने माना कि नागरिक कानूनी प्रक्रिया में फंसने के डर से शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं, इसलिए ये स्वयंसेवक पुलिस तथा जनता के बीच माध्यम का काम करेंगे और पुलिस तुरंत कानूनी कार्रवाई करेगी।

