मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने नगर निगम के एक अधिकारी पर एक लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। अदालत ने साफ निर्देश दिया है कि यह राशि अधिकारी को अपनी निजी जेब से चुकानी होगी, सरकारी खजाने से इसका भुगतान नहीं किया जाएगा। यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक सख्त संदेश माना जा रहा है कि कानून की जानकारी के बिना पारित आदेशों की कीमत अब उन्हें खुद चुकानी पड़ सकती है।
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निरस्त हो चुकी धाराओं के आधार पर जारी हुआ था आदेश
मामला बाफना अस्पताल एवं ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्रा.लि. से जुड़ा है। अस्पताल प्रबंधन ने इंदौर नगर निगम के 30 सितंबर के आदेश और उसके आधार पर 7 अक्तूबर को जारी की गई लेजर रिपोर्ट को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल और अधिवक्ता जयेश गुरनानी ने अदालत के समक्ष पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज मुंशी और अधिवक्ता शशांक श्रीवास्तव उपस्थित हुए।
नगर निगम ने खुद माना आदेश कानून के विपरीत
सुनवाई के दौरान नगर निगम के वरिष्ठ अधिवक्ता ने निगम अधिकारी के निर्देशों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि विवादित आदेश प्रथम दृष्टया कानून के विपरीत है। इसके साथ ही निगम ने यह भी कहा कि वह इस आदेश और लेजर रिपोर्ट को वापस ले रहा है। अदालत ने निगम के इस बयान को रिकॉर्ड पर ले लिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि केवल आदेश वापस ले लेने से अधिकारी की गंभीर गलती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
2020 में ही विलोपित हो चुकी थीं तीनों धाराएं
उच्च न्यायालय ने पाया कि संबंधित अधिकारी ने नगर निगम अधिनियम की धारा 143, 146 और 153 का उपयोग करते हुए यह आदेश पारित किया था, जबकि ये तीनों धाराएं वर्ष 2020 में ही विलोपित की जा चुकी थीं। न्यायमूर्ति संदीप नटवरलाल भट्ट की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अधिकारियों को अपने अधिकारों का प्रयोग प्रचलित कानून के अनुसार ही करना चाहिए। निरस्त हो चुकी धाराओं के आधार पर निर्णय पारित करना एक गंभीर कानूनी चूक है। ऐसी गलती के कारण याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय की शरण में आना पड़ा और न्यायपालिका का बहुमूल्य समय भी खर्च हुआ।
सात दिनों के भीतर व्यक्तिगत भुगतान का निर्देश
अदालत ने अधिकारी पर लगाई गई एक लाख रुपये की कॉस्ट के भुगतान के लिए समय-सीमा और तरीका भी तय कर दिया है। निर्देशों के अनुसार 75 हजार रुपये की राशि मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, इंदौर में जमा करनी होगी। वहीं 25 हजार रुपये की राशि याचिकाकर्ता बाफना अस्पताल को वाद-व्यय के रूप में दी जाएगी। आदेश जारी होने की तारीख से सात दिनों की समय-सीमा के भीतर यह राशि जमा करना अनिवार्य होगा। इस राशि की वसूली संबंधित अधिकारी से ही की जाएगी, ताकि आम जनता के पैसे या सरकारी खजाने पर कोई अतिरिक्त भार न पड़े।
प्रशासनिक लापरवाही पर रोक और वित्तीय जवाबदेही का संदेश
उच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि नगर निगम जैसी जिम्मेदार वैधानिक संस्था के अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के मौजूदा प्रावधानों की पूरी जानकारी रखें और उन्हीं के अनुसार निर्णय लें। संबंधित अधिकारी ने कानूनी प्रावधानों की समुचित जांच किए बिना यांत्रिक तरीके से आदेश पारित किया, जिसके कारण अस्पताल प्रबंधन को न्याय पाने के लिए अदालत का रुख करना पड़ा। अदालत ने कहा कि अधिकारियों की गलत कार्रवाई से पैदा होने वाली मुकदमों की स्थिति का आर्थिक बोझ अनावश्यक रूप से सार्वजनिक धन पर नहीं डाला जाना चाहिए। इस तरह का जुर्माना लगाने का मुख्य उद्देश्य ऐसी प्रशासनिक गलतियों को रोकना और अधिकारियों को उनके कानूनी दायित्वों के प्रति पूरी तरह जवाबदेह बनाना है। अदालत ने उम्मीद जताई है कि भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

