मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में प्रदर्शन में शामिल हुए एक मेधावी छात्र के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी, आरोप पत्र और निचली अदालत के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि संबंधित लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत अदालत संज्ञान नहीं ले सकती। अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के कारण किसी प्रतिभाशाली छात्र का पूरा करियर आपराधिक प्रक्रिया में उलझाकर खराब नहीं किया जा सकता।
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क्या था पूरा मामला
यह मामला बड़वानी जिले के पलसूद थाने से जुड़ा है। पुलिस ने 30 जून 2024 को आदिवासी समुदाय के कुछ सदस्यों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। इसके विरोध में जय आदिवासी युवा शक्ति के कार्यकर्ताओं ने 6 जुलाई 2024 को पलसूद थाने में प्राथमिकी निरस्त करने के लिए आवेदन दिया था। इस दौरान सुमेर सिंह, सीमा, विक्रम, तुकाराम, कमल, अनिल और राजेश अचालिया सहित सात लोग बैनर लेकर पहुंचे और नारेबाजी की। पुलिस का दावा था कि राजपुर के उपविभागीय अधिकारी से जुलूस और प्रदर्शन की अनुमति नहीं ली गई थी। जिला दंडाधिकारी द्वारा 7 जून 2024 को धारा 144 के तहत जारी आदेश के उल्लंघन के आरोप में सातों लोगों के खिलाफ बीएनएस की धारा 223 के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया। जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र में बीएनएस की धारा 126(2) भी जोड़ दी, जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनकारियों के एकत्र होने से पुलिसकर्मियों के शासकीय कार्य में बाधा पहुंची। निचली अदालत ने 16 दिसंबर 2024 को इस मामले में संज्ञान लिया था।
लिखित शिकायत के बिना संज्ञान नहीं
याचिकाकर्ता राजेश अचालिया की ओर से अधिवक्ता पर्व बिरला ने तर्क रखा कि बीएनएस की धारा 223 के मामलों में बीएनएसएस की धारा 215 के अनुसार संबंधित लोक सेवक या उसके वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की लिखित शिकायत अनिवार्य है। जिला दंडाधिकारी की ओर से ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी और पुलिस ने स्वयं प्राथमिकी दर्ज कर ली थी। उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार किया और कहा कि बीएनएसएस की धारा 215 के तहत धारा 206 से 223 तक के अपराधों में लिखित शिकायत के बिना संज्ञान संभव नहीं है।
एक ही घटना को बांटकर कार्रवाई नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 223 और धारा 126(2) के आरोप एक ही घटना से जुड़े हैं, इसलिए इन्हें अलग-अलग करके कार्रवाई नहीं हो सकती। उच्चतम न्यायालय के देवेंद्र कुमार मामले का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि लिखित शिकायत की बाध्यता से बचने के लिए एक ही घटना के अपराधों को पृथक नहीं किया जा सकता। इसके अलावा जांच एजेंसी द्वारा 8 जुलाई 2024 को तैयार अपराध विवरण फॉर्म और घटनास्थल का नक्शा देखने पर पाया गया कि प्रदर्शनकारी थाना भवन से कुछ दूरी पर खड़े थे। इससे शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का आरोप भी गलत साबित हुआ।
मेधावी छात्र का उज्ज्वल भविष्य बचाया
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता की शैक्षणिक उपलब्धियों का विशेष रूप से उल्लेख किया। राजेश अचालिया ने बारहवीं कक्षा में पांच में से चार विषयों में और दसवीं कक्षा में दो विषयों में विशेष स्थान हासिल किया है। उसने डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन पूरा किया है और प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा भी उत्तीर्ण की है। न्यायमूर्ति ने माना कि ऐसे प्रतिभाशाली और मेधावी छात्र को महज विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनने के कारण अनावश्यक रूप से आपराधिक कार्रवाई में नहीं घसीटा जाना चाहिए। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए 16 दिसंबर 2024 के संज्ञान आदेश, पलसूद थाने में दर्ज प्राथमिकी तथा उसके आधार पर प्रस्तुत आरोप पत्र को निरस्त कर दिया है।

