इंदौर में इस वर्ष मानसून में औसत से कम बारिश के बाद आने वाले समय में जल संकट और गंभीर होने की आशंका जताई गई है। स्टेट प्रेस क्लब, मध्य प्रदेश की ओर से अभिनव कला समाज सभागार में ‘जल संकट से जल सुरक्षा’ विषय पर हुई परिचर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए सिर्फ नगर निगम या प्रशासन के भरोसे नहीं रहा जा सकता, बल्कि हर नागरिक को पानी के संरक्षण और जिम्मेदार उपयोग की आदत अपनानी होगी। जल संग्रहण के साथ उपलब्ध पानी का सुनियोजित प्रबंधन भी उतना ही जरूरी बताया गया।

नर्मदा पर निर्भरता, फिर भी असमान वितरण
इंदौर की जलापूर्ति का बड़ा हिस्सा करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित नर्मदा नदी से आने वाले पानी पर निर्भर है, फिर भी शहर में नर्मदा जल का समान और प्रभावी वितरण नहीं हो पा रहा है। जल की बर्बादी, भूजल का लगातार गिरता स्तर और वितरण व्यवस्था की खामियां समस्या को और जटिल बना रही हैं। परिचर्चा में भूजल संरक्षण, नर्मदा जल वितरण, वर्षा जल संग्रहण, पर्यावरण संतुलन और भविष्य की जल जरूरतों पर विस्तार से चर्चा हुई।
भूजल हजार फीट तक, 2057 की योजना की मांग
भारत सरकार के पेयजल मिशन के निदेशक एवं भूवैज्ञानिक सुधीन्द्र मोहन शर्मा ने कहा कि इंदौर की अपनी कोई नदी नहीं है। शहर नर्मदा से पानी लेता है, जबकि स्थानीय स्तर पर भूजल ही प्रमुख स्रोत है। करीब 75 वर्ष पहले शहर में कुओं और बावड़ियों से जल संग्रहण व आपूर्ति की व्यवस्था थी। बाद में हैंडपंप का दौर आया, जब 30 से 75 फीट की गहराई पर पानी मिल जाता था। आज स्थिति बदल गई है और कई स्थानों पर भूजल स्तर लगभग एक हजार फीट तक पहुंच गया है, जो बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि इंदौर में इजराइल जैसे देश की तुलना में ढाई गुना अधिक बारिश होती है, इसलिए हालात पूरी तरह निराशाजनक नहीं हैं, लेकिन सिर्फ 2027 की नहीं, वर्ष 2057 की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयारी करनी होगी। शहर का भूजल स्तर दर्शाने वाला विस्तृत नक्शा बनाने, प्रशासन के 15 स्थानों पर लगे पीजोमीटर की नियमित निगरानी और फ्लो मीटर लगाने की जरूरत भी उन्होंने बताई। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हर स्थान पर वाटर रिचार्ज सिस्टम लगाने से यह तय नहीं कि वर्षा का पानी जमीन के भीतर पहुंच ही जाए — इंदौर में केवल आठ प्रतिशत स्थान ऐसे हैं, जहां बेहतर भूजल पुनर्भरण की संभावना है। नगर निगम इंदौर की जल नीति तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है और नागरिक इसमें अपने सुझाव दे सकते हैं।
नर्मदा का पानी कहां जा रहा है, वितरण पर सवाल
एसजीएसआईटीएस के सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. संदीप नरुलकर ने नर्मदा जल के असमान वितरण पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार इंदौर की करीब 54 प्रतिशत आबादी तक ही नर्मदा का पानी पहुंचता है, जबकि शेष क्षेत्रों में बोरिंग और टैंकरों से जलापूर्ति होती है। रहवासियों को एक दिन छोड़कर नर्मदा का पानी मिलता है और जलापूर्ति के आंकड़ों में भी भ्रम की स्थिति है। नगर निगम का दावा है कि नर्मदा परियोजना से प्रतिदिन 360 मिलियन लीटर पानी इंदौर पहुंचता है, जबकि बोरिंग से करीब 75 मिलियन लीटर पानी मिलता है। इसके बावजूद वास्तविक जल वितरण लगभग 243 मिलियन लीटर ही बताया जाता है, जिससे सवाल उठता है कि शेष पानी का उपयोग कहां हो रहा है। उन्होंने चेताया कि नर्मदा से इंदौर तक पानी लाने में अत्यधिक बिजली खर्च होती है और इतनी महंगी व्यवस्था के बावजूद पानी का जिम्मेदारी से उपयोग नहीं हो रहा है। उनके अनुसार जनवरी और फरवरी का समय किसी तरह निकल सकता है, लेकिन मार्च में जल संकट की असली चुनौती सामने आ सकती है। इसलिए सबसे पहले वाटर लीकेज और पानी की बर्बादी रोकने पर ध्यान देना होगा। निजी हाइड्रेंट वाटर टैंकर सेवाओं और कार वॉश सेंटरों के संचालन के लिए भी स्पष्ट नीति बनाने की जरूरत बताई गई।
बारिश का सही प्रबंधन हो तो 16 महीने की राहत संभव
पर्यावरणविद् डॉ. दिलीप बाघेला ने कहा कि इंदौर जिले में औसतन 35 इंच बारिश होती है। यदि इस वर्षा जल का योजनाबद्ध तरीके से संरक्षण किया जाए, तो करीब 16 महीने तक पानी की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। लेकिन जल प्रबंधन की कमी का खामियाजा पूरे शहर को भुगतना पड़ रहा है। कम बारिश का असर सिर्फ शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है — ग्रामीण इलाकों में स्थिति और गंभीर है, जहां सिंचाई के लिए पानी न मिलने से बड़ी संख्या में फसलें प्रभावित हो रही हैं और टैंकरों से भी हर जगह पानी पहुंचाना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले पुनासा, ओंकारेश्वर और यशवंत सागर बांधों में कई बार पानी का ओवरफ्लो होता था, लेकिन अब ऐसी स्थिति धीरे-धीरे अतीत की बात बनती जा रही है। जंगलों का करीब 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा कट चुका है, जिससे अच्छी बारिश की उम्मीद करना कठिन होता जा रहा है। उन्होंने नागरिकों से प्रतिदिन प्रति व्यक्ति कम से कम 10 लीटर पानी बचाने का संकल्प लेने की अपील की।
घरेलू बचत और ठोस नीति पर जोर
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की हिंदी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उपासना गुप्ता ने कहा कि घरेलू उपयोग में पानी की खपत नियंत्रित करके बड़ी मात्रा में जल बचाया जा सकता है। एक ही पानी का दोबारा उपयोग करने की आदत और घरों के बाद बचे उपयोगी पानी को पेड़-पौधों में इस्तेमाल करने का सुझाव उन्होंने दिया। परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने कहा कि जल संकट से बचने के लिए अभी से योजनाबद्ध तरीके से काम शुरू करना होगा और एक प्रभावी, ठोस जल नीति बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने भी चेताया कि समय रहते पानी के गलत उपयोग और अव्यवस्थित प्रबंधन पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में शहर को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। परिचर्चा का मूल संदेश स्पष्ट रहा कि इंदौर को भविष्य के जल संकट से बचाने के लिए सिर्फ नर्मदा जल पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा — भूजल संरक्षण, समान जल वितरण, लीकेज पर नियंत्रण, वर्षा जल का वैज्ञानिक प्रबंधन और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी को मिलाकर एक दीर्घकालिक जल सुरक्षा नीति तैयार करना समय की मांग है।

