पार्किंसन बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए जापान से उम्मीद की एक बड़ी खबर आई है। हाथ-पैरों में कंपन, चलने-फिरने में परेशानी और शरीर का संतुलन बिगड़ना इस बीमारी की आम समस्याएं हैं, जो मरीजों की रोजमर्रा की जिंदगी को बेहद मुश्किल बना देती हैं। इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन जापानी वैज्ञानिकों ने एक नई स्टेम सेल तकनीक के जरिए इसके उपचार की उम्मीद जगाई है। शुरुआती परीक्षण के नतीजे उत्साहजनक रहे हैं।

क्या है आईपीएस स्टेम सेल तकनीक
इस तकनीक को इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल यानी आईपीएस तकनीक कहा जाता है। इसमें शरीर की सामान्य विकसित कोशिकाओं को दोबारा शुरुआती अवस्था में लाया जाता है और फिर उनसे जरूरत के मुताबिक नई कोशिकाएं तैयार की जाती हैं। पार्किंसन में दिमाग की वे कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं, जो शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले डोपामाइन रसायन का निर्माण करती हैं। वैज्ञानिकों ने स्वस्थ डोनर की स्टेम सेल से डोपामाइन बनाने वाली कोशिकाओं के शुरुआती रूप तैयार किए और उन्हें मरीज के दिमाग के खास हिस्से में प्रत्यारोपित किया, ताकि वे विकसित होकर डोपामाइन का उत्पादन कर सकें।
सात मरीजों पर हुआ शुरुआती परीक्षण
क्योटो यूनिवर्सिटी अस्पताल में 50 से 69 वर्ष की उम्र के सात मरीजों पर इस तकनीक का शुरुआती परीक्षण किया गया। मरीजों के दिमाग के दोनों हिस्सों में स्टेम सेल से तैयार कोशिकाएं प्रत्यारोपित की गईं। मेडिकल जर्नल नेचर में प्रकाशित नतीजों के अनुसार, छह मरीजों में इलाज के प्रभाव का आकलन किया जा सका। इनमें से चार मरीजों के लक्षणों में सुधार देखा गया, जबकि पांच मरीजों में दवा लेने के बाद की स्थिति भी बेहतर हुई। कुछ मरीजों में हल्के दुष्प्रभाव भी सामने आए, जिन पर वैज्ञानिकों की नजर बनी हुई है।
अभी स्थायी इलाज का दावा नहीं
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि शुरुआती नतीजे भले ही उम्मीद जगाने वाले हों, लेकिन इसे पार्किंसन का स्थायी इलाज मानना अभी जल्दबाजी होगी। जापान में इस उपचार को शर्तों के साथ मंजूरी मिली हुई है। संबंधित कंपनी मार्च 2029 तक 20 से 30 मरीजों पर इसका परीक्षण करने की योजना बना रही है। इसके बाद ही इसकी सुरक्षा और लंबे समय तक प्रभावशीलता को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी। फिर भी, डोपामाइन कोशिकाओं को दोबारा विकसित करने की दिशा में यह एक अहम कदम माना जा रहा है।
क्यों अहम है यह शोध
पार्किंसन दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करता है और मौजूदा दवाएं केवल लक्षणों को कुछ समय के लिए नियंत्रित कर पाती हैं। कोशिकाओं को दोबारा विकसित करने वाली तकनीक अगर बड़े परीक्षणों में भी सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो यह बीमारी के इलाज की दिशा ही बदल सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है, लेकिन शुरुआती सफलता ने इस दिशा में शोध को नई गति दे दी है।

