सूरज के रहस्यमय विस्फोटों को समझने में भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों को बड़ी कामयाबी मिली है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने 16 अक्टूबर को बताया कि भारत के आदित्य-L1 और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्रोबा-3 ने पहली बार एक ही सौर विस्फोटों का संयुक्त अध्ययन किया है। इस अध्ययन से सूर्य के कोरोना में होने वाली हलचल और उसकी ऊर्जा के बंटवारे के बारे में नई और सटीक जानकारी मिली है।


दो यंत्र, एक नजरिया
इस अध्ययन में बेंगलुरु के भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के शोधकर्ताओं ने दो अलग-अलग यंत्रों के आंकड़ों को मिलाया। आदित्य-L1 पर लगे वीईएलसी यंत्र ने स्पेक्ट्रोस्कोपी के जरिए कोरोना का अध्ययन किया, जबकि प्रोबा-3 पर लगे एस्पिक्स यंत्र ने इमेजिंग के जरिए उसी क्षेत्र की तस्वीरें लीं। दोनों यंत्रों ने सूर्य के कोरोना के लगभग एक ही हिस्से को दो अलग तरीकों से देखा। इसरो के अनुसार, एक ही यान से मिलने वाले आंकड़ों की तुलना में इस संयुक्त अध्ययन से विस्फोटों के विकास को कहीं गहराई से समझा जा सका। यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में प्रकाशित हुआ है।
दो विस्फोटों में क्या मिला
शोधकर्ताओं ने कोरोना से प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के बड़े पैमाने पर बाहर निकलने वाली घटनाओं, यानी कोरोनल मास इजेक्शन का अध्ययन किया। जुलाई से दिसंबर 2025 के बीच दोनों यंत्रों ने 14 और 16 सितंबर को दो विस्फोट दर्ज किए। 14 सितंबर वाला विस्फोट तेज था, जिसकी रफ्तार करीब 645 किलोमीटर प्रति सेकंड थी। 16 सितंबर वाला विस्फोट काफी धीमा था, करीब 145 किलोमीटर प्रति सेकंड, लेकिन ऊंचाई के साथ इसका घनत्व ज्यादा तेजी से घटा, जो इसके शुरुआती फैलाव के ज्यादा तेज होने का संकेत है।
ऊर्जा के बंटवारे में भी दोनों विस्फोट अलग निकले। 14 सितंबर वाले विस्फोट में तापीय ऊर्जा कुल ऊर्जा की केवल करीब एक प्रतिशत थी। वहीं, 16 सितंबर वाले विस्फोट में तापीय ऊर्जा बढ़ते-बढ़ते गतिज ऊर्जा के बराबर पहुंच गई। अनुमान के मुताबिक, चुंबकीय ऊर्जा गतिज ऊर्जा के बराबर या उससे ज्यादा थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि इमेजिंग करने वाले और स्पेक्ट्रम मापने वाले कोरोनाग्राफ की जोड़ी से विस्फोटों की उत्पत्ति और विकास की ज्यादा पूरी और जांची-परखी तस्वीर मिलती है।
क्यों मुश्किल था यह अध्ययन
सूर्य की सतह के बेहद करीब विस्फोटों को देखना हमेशा से चुनौती रहा है। पहले के अंतरिक्ष कोरोनाग्राफ इस काम में केवल आंशिक रूप से ही सफल हो पाते थे। वे हल्के विस्फोटों के शुरुआती विकास को ठीक से पकड़ नहीं पाते थे, जिससे यह समझ अधूरी रह जाती थी कि भीतरी कोरोना में ऊर्जा गतिज, तापीय और चुंबकीय रूपों में कैसे बंटती है। आदित्य-L1 और प्रोबा-3 की जोड़ी ने इस कमी को दूर करने की क्षमता दिखाई है। एस्पिक्स की तेज तस्वीरों से विस्फोट के आकार, गति और द्रव्यमान का सटीक अनुमान मिला, जबकि वीईएलसी के स्पेक्ट्रोस्कोपी आंकड़ों से करीब 20 लाख डिग्री गर्म गैस के घनत्व और तापीय ऊर्जा की स्वतंत्र जानकारी मिली।
दोनों मिशनों का सफर
आदित्य-L1 भारत का पहला समर्पित सौर मिशन है, जिसे 2 सितंबर 2023 को पीएसएलवी-C57 से प्रक्षेपित किया गया था। प्रोबा-3 यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का मिशन है, जिसे 5 दिसंबर 2024 को श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-XL के जरिए प्रक्षेपित किया गया था। प्रोबा-3 के दो यान करीब 150 मीटर की दूरी पर उड़ते हैं और एक यान दूसरे पर छाया डालता है, जिससे कृत्रिम सूर्यग्रहण जैसी स्थिति बनती है और कोरोना को साफ देखा जा सकता है।
क्यों अहम है यह खोज
सौर विस्फोटों की समझ अंतरिक्ष मौसम के पूर्वानुमान के लिए अहम है, क्योंकि ये विस्फोट पृथ्वी की ओर आने पर उपग्रहों, संचार प्रणालियों और बिजली के बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर सकते हैं। विस्फोटों के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जा के सटीक मापन से वैज्ञानिक उनके शुरुआती विकास को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और आने वाले समय में अंतरिक्ष मौसम की सटीक भविष्यवाणी की राह खुलेगी।


