रसोई में इस्तेमाल होने वाली हल्दी अब पानी साफ करने के काम भी आ सकती है। मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST) के वैज्ञानिकों ने हल्दी की मदद से एक ऐसी सामग्री तैयार की है, जो औद्योगिक रंगों से प्रदूषित पानी को साफ कर सकती है। इस शोध की जानकारी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 13 अक्टूबर को जारी की। शोध के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एडवांस्ड फंक्शनल मैटेरियल्स में प्रकाशित हुए हैं।


हल्दी से बने नैनोकणों का कमाल
शोधकर्ताओं ने हल्दी के अर्क का इस्तेमाल कर जिंक ऑक्साइड के नैनोकण बनाए। हल्दी में मौजूद प्राकृतिक यौगिक इन नैनोकणों के बनने और स्थिर रहने में मदद करते हैं। इस तरीके से कुछ पारंपरिक रासायनिक प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले हानिकारक पदार्थों पर निर्भरता भी घटती है। इन सूक्ष्म कणों को जैव-अपघटनीय पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA) के नैनोफाइबर में स्थिर किया गया, जिससे एक झिल्ली जैसा ढांचा तैयार हुआ। यह ढांचा प्रदूषकों के संपर्क को बढ़ाता है और सामग्री को संभालना आसान बनाता है।
प्रकाश और कंपन का डबल असर
इस फिल्टर की खासियत यह है कि यह दो तरीकों से एक साथ काम करता है। जिंक ऑक्साइड प्रकाश के प्रभाव में रासायनिक प्रतिक्रियाएं शुरू करता है, जिसे प्रकाश-उत्प्रेरण कहते हैं। साथ ही, यांत्रिक कंपन से पैदा होने वाला पीजोइलेक्ट्रिक प्रभाव भी जोड़ा गया। मंत्रालय के मुताबिक इससे ऊर्जा वाहकों के पुनर्संयोजन में कमी आई और प्रदूषक तोड़ने वाली प्रतिक्रियाएं तेज हुईं। यानी रोशनी और कंपन दोनों मिलकर रंग के अणुओं को तोड़ते हैं।
लैब में नतीजे — 98.6% तक रंग साफ
प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में यह सामग्री काफी असरदार साबित हुई। प्रकाश और अल्ट्रासोनिक कंपन की संयुक्त स्थिति में 120 मिनट के भीतर मेथिलीन ब्लू रंग में 98.6 प्रतिशत और कॉन्गो रेड रंग में 96.7 प्रतिशत कमी दर्ज की गई। शोध में बैक्टीरिया पर भी परीक्षण किया गया — छह घंटे बाद ई. कोलाई के लगभग 75 प्रतिशत और स्टैफिलोकोकस ऑरियस के लगभग 71 प्रतिशत बैक्टीरिया निष्क्रिय पाए गए। हालांकि इसका मतलब पूर्ण कीटाणुशोधन नहीं है।
AI की भूमिका
इस शोध में मशीन लर्निंग का भी इस्तेमाल किया गया। AI मॉडल ने समय, प्रकाश की तीव्रता, उत्प्रेरक की मात्रा, अल्ट्रासोनिक आवृत्ति और रंग की सांद्रता जैसे कारकों को ध्यान में रखकर रंग हटने की प्रक्रिया का अनुमान लगाया। इससे अलग-अलग परिस्थितियों में नतीजों का विश्लेषण आसान हुआ। लेकिन शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि AI मॉडल प्रयोगशाला परीक्षण का विकल्प नहीं है।
अभी लैब तक ही सीमित
यह तकनीक कपड़ा और रंगाई उद्योग के लिए खास तौर पर अहम हो सकती है, जहां के अपशिष्ट जल में स्थायी कार्बनिक रंग एक बड़ी चुनौती हैं। कुछ पारंपरिक तरीके प्रदूषक को अलग तो करते हैं, लेकिन उसे नष्ट नहीं करते। नई सामग्री प्रदूषकों के विघटन का रास्ता दिखाती है। फिर भी यह समझना जरूरी है कि ये नतीजे नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में मिले हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी औद्योगिक पानी को दो घंटे में पीने योग्य बनाया जा सकता है। बड़े पैमाने पर परीक्षण, फिल्टर का पुनः उपयोग, लागत और उपचारित पानी की समग्र गुणवत्ता का मूल्यांकन अभी बाकी है।


