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Friday, October 16, 2026
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चंडीगढ़ के 111 वैज्ञानिक दुनिया के शीर्ष 2% में, PGI-PU की शान

चंडीगढ़। शोध के क्षेत्र में चंडीगढ़ ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और वैश्विक प्रकाशक एल्सेवियर की ओर से वर्ष 2026 के लिए जारी ‘दुनिया के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों’ की प्रतिष्ठित सूची में चंडीगढ़ के 111 शोधकर्ताओं ने अपनी जगह बनाई है। यह उपलब्धि चिकित्सा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में चंडीगढ़ के संस्थानों के वैश्विक शोध प्रभाव को दर्शाती है।

PGI के 55 और पंजाब यूनिवर्सिटी के 56 वैज्ञानिक

इस सूची में पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGI) के कुल 55 शोधकर्ता शामिल हैं। इनमें से 21 वैज्ञानिकों को उनके पूरे करियर के शोध प्रभाव पर आधारित ‘लाइफटाइम श्रेणी’ में स्थान मिला है, जबकि अन्य शोधकर्ता ‘वार्षिक शोध प्रभाव श्रेणी’ में जगह बनाने में कामयाब रहे। वहीं, पंजाब विश्वविद्यालय (PU) के 56 शोधकर्ताओं ने भी इस प्रतिष्ठित सूची में जगह बनाई है। इनमें से 28 को लाइफटाइम श्रेणी और 54 को वार्षिक श्रेणी में रखा गया है। पंजाब यूनिवर्सिटी के 26 वैज्ञानिकों के नाम दोनों श्रेणियों में साझा होने के कारण कुल 56 अद्वितीय शोधकर्ता इस सूची का हिस्सा बने हैं।

चयन के कड़े मानक

वैज्ञानिकों का यह वैश्विक चयन ‘स्कोपस’ डेटाबेस के व्यापक आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर किया जाता है। इसमें प्रकाशित शोधपत्रों की कुल संख्या, अन्य शोधकर्ताओं द्वारा दिए गए उद्धरणों का प्रभाव, शोध की गुणवत्ता और निरंतरता को मापने वाले एच-इंडेक्स और शोधपत्रों में लेखक की भूमिका जैसे प्रमुख मानकों का आकलन किया जाता है। वार्षिक श्रेणी में मुख्य रूप से वर्ष 2025 के दौरान हुए शोध प्रभाव को मापा गया है, जबकि लाइफटाइम श्रेणी शोधकर्ताओं के पूरे करियर के अकादमिक योगदान को दर्शाती है।

इन क्षेत्रों में दिया योगदान

इन शोधकर्ताओं ने चिकित्सा जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिकी, पर्यावरण विज्ञान, माइक्रोबायोलॉजी, फार्मेसी, इंजीनियरिंग, पदार्थ विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी जैसे विषयों में अभूतपूर्व योगदान दिया है। पंजाब विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर मीनाक्षी गोयल ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए इसे संकाय सदस्यों के उत्कृष्ट शोध, बहु-विषयक सहयोग और विश्वविद्यालय की बढ़ती वैश्विक पहचान का प्रमाण बताया। उनका कहना है कि यह मूल्यांकन किसी विशेष पुरस्कार के बजाय लंबे समय तक बने रहने वाले अकादमिक प्रभाव को रेखांकित करता है।

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